बांग्लाभाषी क्रांतिकारी शचीन्द्र बाबू को बर्दाश्त नहीं था हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार

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काकोरी कांड के नायक शचीन्द्र नाथ सान्याल बांग्लाभाषी थे, लेकिन वह हिन्दी को भारतीय अस्मिता का प्रतीक मानते थे। उन्हें हिन्दी और अंग्रेजी शिक्षकों के वेतन के अंतर को लेकर मलाल रहता था। अपनी पत्नी से कई बार उन्होंने इसे साझा भी किया था। अपनी आत्मकथा ‘बंदी जीवन’ की प्रस्तावना में भी वे खुद की अच्छी हिन्दी न होने पर अफसोस जाहिर करते हैं, साथ ही पाठकों को भरोसा देते हैं कि अगला संस्करण हिन्दी में ही होगा।

कोलकाता में रहने वाली बहू कृष्णा सान्याल ने साझा कीं क्रांतिकारी ससुर के हिन्दी प्रेम से जुड़ी यादें
घर में पढ़ाने आए हिन्दी शिक्षक के कम वेतन की जानकारी पाकर भड़क गए थे क्रान्तिकारी शचीन्द्र नाथ
काकोरी कांड के नायक शचीन्द्र नाथ सान्याल हिन्दी को मानते थे राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक 

कोलकाला में रहने वाली उनकी बहू कृष्णा सान्याल जो अब 92 साल की हो गई हैं, बताती हैं कि ‘मैं पिता जी से तो नहीं मिली, लेकिन पति और मां ने जो बताया उससे साफ है कि वे हिन्दी को राष्ट्रप्रेम की भाषा मानते थे।’ वह एक वाकया बताती हैं कि ‘मां ने बेटे (यानी मेरे पति) के लिए हिन्दी शिक्षक रखा हुआ था। पिता जी जेल से छूटे तो शिक्षक से रूबरू हुए। पूछा कि कितना वेतन पाते हो। शिक्षक ने काफी कम रकम बताई। फिर उन्होंने अंग्रेजी के शिक्षकों के वेतन के बारे में जानकारी ली जो हिन्दी शिक्षकों की तुलना में काफी अधिक थी। हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार सुनकर वह व्यथित हुए और मां पर नाराजगी जाहिर की।’

हिन्दी शिक्षकों के कम वेतन की बात ने अंग्रेजों के खिलाफ उनके बागी तेवर को और बढ़ा दिया। कृष्णा बताती हैं कि ‘पिता जी की आपत्ति हिन्दी के अध्यापक को भी अच्छी नहीं लगी पर वे हिन्दी के प्रचार-प्रसार में शिद्दत से लग गए।’ अमेरिका में रहने वाली बुजुर्ग भतीजी गीता मुकुटमोनी भी शतीन्द्र बाबू के हिन्दी प्रेम को साझा करती हैं। वह बताती हैं कि ‘बड़े पिताजी ने महात्मा गांधी को हिन्दी में पत्र लिखा था, जिसे यंग इंडिया में प्रकाशित किया गया।’

हिन्दी में ‘अग्रगामी’ नाम से दैनिक पत्र निकाला
वर्ष 1937 में संयुक्त प्रदेश में कांग्रेस मंत्रिमंडल की स्थापना के बाद अन्य क्रांतिकारियों के साथ शचीन्द्र बाबू रिहा किए गए। रिहा होने पर कुछ दिनों तक कांग्रेस के प्रतिनिधि थे, बाद में फारवर्ड ब्लाक में शामिल हुए। इसी दौरान काशी में उन्होंने ‘अग्रगामी’ नाम से एक दैनिक पत्र निकाला। हिन्दी में प्रकाशित होने वाले पत्र के वह संपादक थे। हिन्दी के प्रति उनका प्रेम उनकी आत्मकथा ‘बंदी जीवन’ की प्रस्तावना में भी दिखता है। 13 सितंबर को लिखी प्रस्तावना में वह लिखते हैं कि ‘आधुनिक विज्ञान एवं ऐतिहासिक खोज की प्रणाली की सहायता से भारतीय विप्लव आन्दोलन का एक प्रामाणिक इतिहास अलग ही लिखने की प्रबल आकांक्षा है, इसलिए प्रस्तुत पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ में कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया गया। इस पुस्तक की हिन्दी भी मेरी नहीं है। इस बार जेल से छूटने के बाद से हिन्दी में लिखना आरम्भ किया है। इच्छा है कि अगले सस्करण में अनुवाद की महायता न लेकर मैं हिन्दी में ही मूल ग्रन्थ लिखूं। इस ग्रन्थ की त्रुटियों के लिए पाठकवर्ग से क्षमा का भिखारी हूँ।’

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